
प्रेममयी श्री राधारानी, मैया हो व्रज की महारानी। प्रेम सृष्टि का है आधार, प्रेम ही करता बेड़ा पार। प्रेम अगर तो सब कुछ साचा, कृष्ण भी साचा राम भी साचा, राधा साची मीरा साची, कृष्ण प्रेम तो सब कुछ साचा, निर्गुण साचा सगुण भी साचा, वृन्दावन बरसाना साचा, गोवर्धन परिक्रमा साचा, ज्ञानी और अज्ञानी साचा। भाव नहीं तो सब कुछ झूठा, माया ने सब कुछ है लूटा, प्रेममयी श्री राधारानी, मैया हो व्रज की महारानी। कृष्ण भक्ति की हो अगर लालसा, रखना नहीं माया की लालसा, करना हो गर प्रेम प्रभु से प्रभु से, तरणा हो भव सिन्धु समर से, बचना है गर काल-व्याल से, हो निवृत मद मोह लोभ से, काम क्रोध सब विषय मिटाकर, शरणागत हो राधा रानी के, प्रेममयी श्री राधा रानी मैया हो व्रज की महारानी। नाकर मन रे तु मनमानी, जय बोलो बरसानेवाली। प्रेम भक्ति को लेकर उर में, भक्ति भाव का दीप जलाकर, कुपथ मार्ग को छोड़ सुपथ पर, जीवन बड़ा क्षणिक है भैया, अपना ठौर कहाँ है भैया, कृष्ण प्रेम का अलख जगाकर, शरणागति भाव को लेकर, जा तु उस द्वार पे जा , भव से पार करे महारानी, प्रेममयी श्री राधा रानी,

