उसको क्या मैं बताऊँ, उससे क्या मैं छुपाऊँ, वो जो ख़ुद ही तो अंतर्यामी है। कैसे मंदिर बनाऊँ, क्या क्या भोग लगाऊँ, वो जो संसार का ख़ुद स्वामी है। ख़ुद को क्यों मैं रुलाऊँ, आँसू व्यर्थ बहाऊँ, वो तो सुख-दुःख का मेरे साथी हैं। मन में शंका न लाऊँ, क्यों भला घबराऊँ, जिससे हर विपदा घबराती है। क्यों ही फूल चढ़ाऊँ, क्यों ही दीप जलाऊँ, जिसको प्रेम की भाषा ही आती है। करूँ सबका भला, कभी दिल न दुखाऊँ, उसको इतनी सी बात रिझाती है। उसको क्या मैं बताऊँ, उससे क्या मैं छुपाऊँ, वो जो ख़ुद ही तो अंतर्यामी है। कैसे मंदिर बनाऊँ, क्या क्या भोग लगाऊँ, वो जो संसार का ख़ुद ही स्वामी है॥


