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Gazhal. Tum Se Kahen Hum!

क्या हमें इजाज़त है, आज तुमसे कहें हम, शिकायत-ए-दिल अपनी, सामने रख दें हम। ⸻ कहीं तुम नाराज़ न हो जाओ ये सुनकर, दास्ताँ-ए-दिल अपनी, कैसे फिर कहें हम। ⸻ क्या हमें इजाज़त है, दिल के ये दर खोलें, खिड़कियाँ भी खोलें, तुमको अंदर बुलाएँ हम। ⸻ हाँ, तुम्हें दिल का ये दीदार भी करा दें, अरमान-ए-दिल अपने, आज सब दिखाएँ हम। ⸻ तुम तो हमारे दिल में यूँ ही बसे हुए हो हर एक धड़कन से हो तुम वाक़िफ़ हो सनम। ⸻ तुम हो हमारी साँस में, तुम हो हर एक लम्हा हमारा फिर तुमको बार-बार क्यों आवाज़ दें हम। ⸻ दिल के ये झरोखों से क्या हाल-ए-दिल दिखाएँ, जब तुम ही जान लेते हो हर राज़-ए-ग़म हमारे ⸻ दास्ताँ-ए-दिल को क्यों अल्फ़ाज़ में ढालें, जज़्बात दिल के अपने क्यों तुमको बताएँ हम। ⸻ शिकवा-गिला का सिलसिला दोहराएँ क्यों हम, गलतियाँ तो होती हैं हमसे भी हरदम। ⸻ फिर ये सफ़ेदपोशी का जामा क्यों पहनाएँ, तुमको फ़रिश्ता कहके क्यों खुद को सताएँ हम।