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शरण एक तेरो लखें महावीर

II महावीर पचीशी II स्वर्गीय पंडित जगदीश कवि द्वारा विरचित: रघुवर श्याम अनुप रूप रमणीय रवि गाता लखण लालायित लाख कमल पै वरणि न जाता अति सुकुमार कुमार कंज पद कोमल ताई कुंज कठोर कुराह राज पद केहि विधि जाई सीता सती सनेहु ते लगि कपीश चरणन परणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। लखन बाण उर लगत प्राण अकुलाई रह्यो है देखि विकल रघुराज चरण तुव जाई गह्यों हैं तब भगवंत अनंत प्रेम लखि के चतुराई हिय लगाय मन भाय- पकड़ीकर कहत बुझाई जीवन औषधि लाइये चले गरजी हा हा करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। मारग़ लंक पयान करत सुरसा एक भेंटि कटु कर बैनन बोली उठी भक्षण भर पेटी कह कपि कपट कराल रूप लघुता कर लीन्हा बदन पैठी बहराई घुमड़ी तोही आशीष दीन्हा सिंधु तर निश्चर लखे ताहि मारी मर्दन करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। मारग लंक पयान करत दुर्जन एक भेंटि शैल विशाल कराल पेखी औषधि ना चिन्हा देहि घमंड उतारि करजोड़ी त्यों कर पे लीन्हा खग समान तुम चले जहाँ रघुपति अकुलाने देखी दया कर सिंधु भयो शशि राका जाने ऐसो तेजप्रयाप तब नाम सदा संकट हरणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। कर चढ़ाई पुनि चले जहाँ सौं लाई रावरो विपति कल के वीर बंधे रघुनाथ बांकुरो करी प्रसंश तू आणश वेष बाँकी कपिराई सुनत वीरता चढ़ी वदन फूले हर्षाई परम प्रतापी तेज तुम सकों नहीं वर्णन करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। लंक संक की चोट पड़े कपि तन के जागे हहरी हहरी हहरान पड़े पुछन्न के लागे झपटी -झपटी पट पकड़ी मारी धरनी डगमग्गे वीर विवश भय जात अंध कूपन मों भग्गे ताहि मारी मर्दन करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। चकित दशानन् चौंक उठ्यो चपला की नाई चपल चलाचित चढ़ी शान बोली धुधुकाई बान ब्रह्म की रचो जाई मारो कपिवर को मन मह किन्ह विचार तहाँ लागत हिय सर को नाग फाँश रचना कियो डारी लियो आपही गरणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। अति गहराये घमंड करहीं कपि रूप कराला कपट कड़ाई नैन चैन ना हिय जसाला ललकि लंगूर लपेटी पट्ट पटकन तेही लाग्यो बब्बर वीर विशाल मूष्टि लागत हिय को मंदोदरी बिहाल हाल पुछेहीं बहु डर पे बड़ कपिश रणधीश पिश् पीशन करी डारे तमकी धारा धर होत धरणी भय कंपत सारे को भटक्यो चट सिंधु मह और खड़े स्तुति करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। कहों काही दुख नाथ कौन सुनत हैं मेरो किरती अतुल्य-अगाध अजर गावत मैं तेरो यदि यह बैन कुबैन कौन सुनहीं महराजा ताहि चरण पर पड़ों कौन राखहीं यह लाजा नाथ दया कर सिंधु हो अबहूँ क्यों न दया करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। महावीर महाराज काज को तुरत बानवे करत ध्यान परवान तुरत गर्जत चली आवे राखी दास की लाज सदा तुम फंद मिटावे फंद हरण तुय नाम हो सकों नाहीं वर्णन करणों शरण एक तेरो लखें महावीर ओढ़र ढरणों। तुलसीदास भगवंत तंत पूरो नहीं जाने प्रभुवर परम कृपाल प्रेम आपहीं दर्शाने जा पर होहीं कृपाल सोई समरथ सब जाने ।।